मुझको ये ग़म तो नहीं कि वो मुझे ना मिला,
दुख बस इसी बात का है कि उसने मुझे किसी और का भी होने ना दिया,
किसी के ग़म में बहा के देखो दो आँसु,
तुम्हारी खुशियाँ भी तुम पर नाज़ करेंगी,
तुम बताओ ना बताओ अपने दिल की बात हमें,
तुम्हारा तकिया बताता है किसी ग़म से परेशान हो तुम,
वो जो हँसते हुए निकल गया तुम्हारे सामने से,
बड़ा माहिर है अपने ग़म छुपाने में,
अजीब फितरत है इन्सान की, इसकी अलग ख्वाईश है,
खुद की खुशी के लिए दूसरों के ग़म की दुआ माँगता है,
ज़िन्दगी से ये गिला कि बहुत ग़म मिले तुझे,
पहले ये बता कितोनो में बाँटी थी खुशियाँ जो मिली थी तुझे,
अजीब है रिश्ता खुशी और ग़म का आपस में,
कुछ भी ज़्यादा मिल जाए तो आँखें भीग जाती हैं,
उन्हे ये ग़म की उन्हें खुशियाँ नहीं मिली,
मुझे ये खुशी कि ग़म ही सही, कुछ तो मिला मुझे,
ये गंम क्या है, खुशी क्या है, मुझे नहीं पता,
उसी का करम है, सब मंज़ूर है मुझे,
बिना किसी बात के अचानक वो ज़ोर से हँस पड़ा,
किसी का दिया पुराना ग़म याद आ गया होगा,
खुशियों में तो मुस्कुरा लेते हैं सभी,
सिंकदर वो है जो ग़मों में भी मायूस ना हो,
कभी खुशियाँ कभी ग़म दिए मुझे,
ऐ ज़िन्दगी कैसे तेरा बार बार तेरा शुक्रिया अदा करुँ,
इन ग़मों का शुक्रिया अदा करो ऐ महफिल वालो,
जो ये ना होते तो ग़ज़लें यूँ लिखता कौन,
शराब में डुबोना चाहते हैं अपने ग़म को कुछ लोग,
कोई बताए उन्हे कि सूखे पत्तों से आग नहीं दबा करती,
प्यार ढूँढते हैं और ग़मों से भागते भी हैं लोग,
जन्नत भी चाहिए और मरना भी नहीं
ये मयखाने, ये जाम, ये महफिल ये शमा, ये मैं, ये मेरा दिल,
सब अधूरे हैं इस ग़म के बिना
किसी को ये ग़म की कोई मिल के जुदा हो गया,
और मुझे अभी तक किसी के मिलने का ही रहा इन्तज़ार,
खुशियों का क्या है आज यहाँ तो कल वहाँ,
ये ग़म तुम्हारे अपने हैं, इनसे गुज़र करना सीख लो
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
८ दिसम्बर, २०११

2 comments:
Behtareen...
आह ... ...उम्दा
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