इस चाँदनी रात मे मै भी एक चाँद का इन्तज़ार करता हूँ,
धरती पर वो चाँद भी मुझे ढूँढ रहा है,
इन तारों की इस बात का मै ऐतबार करता हूँ,
मेरे पास अक्षर कुछ कम हैं,
वरना अपने चाँद के बारे मे तुम्हे बताता,
वो आज मेरे पास होता तो तुम्हे उससे मिलाता,
कि आखिर क्या है उसमे कि अपना दिल उस पर निसार करता हूँ,
बस नाम ना पूछना उस चाँद का,
वो मैं तुम्हे ना बता पाऊँगा,
अगर ज़िद्द करोगे, बस कुछ निशानियाँ तुम्हे दे जाऊँगा,
वो चाँद शर्माता है पर जल्द ही नाराज़ भी हो जाता है,
मओं उसकी ऐसी हर अदा से प्यार करता हूँ
ग़मो के अँधेरे से निकाल कर उसने मुझे हँसी की चाँदनी दी है,
मेरी कविता के काले पड़ते अक्षरों को
रंगीन पन्ने और सतरंगी स्याही दी है,
बस इन्ही शब्दों के कुछ फूल बना कर
उनके गले का मैं हार करता हूँ,
पर शायद आसमाँ के इस चाँद की तरह,
इस चाँद के मेरे जैसे प्यार लुटाते कई तारे हैं,
पर एक दावा करता हूँ मैं,
कोई ख्वाईश तो ज़ाहिर करें वो,
अपने दिल को एक टूटता तारा बनाने को मैं तैयार करता हूँ
ऐ आसमाँ के हंसी तारों,
अपनी आँखे बन्द कर अपने चाँद से आँखें मैं चार करता हूँ
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२१ मार्च, २००८
24/3/08
अपने चाँद का मैं इन्तज़ार करता हूँ
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