कुछ यादें हैं प्यारी सी मन मे,
कुछ हैं तेरी, कुछ हैं मेरी,
ना मिली किसी को, ना किसी ने इन्हे देखा,
ना इनको लिखा किसी ने, ना ही सुना है,
फिर भी है जानी पहचानी सी,
कुछ है तेरी, कुछ है मेरी,
कुछ मासूम सी, कुछ अलबेली,
कुछ अपनी सी, तो कुछ बेगानी,
कुछ चंचल सी, कुछ शर्मीली,
कुछ हँसाती, तो कुछ रुला देती,
कहीं कुछ उलझी, कहीं वीरान सी,
कुछ मस्ती भरी, तो कुछ हैरान सी,
बहुत सी यादें हैं मन मे,
कुछ हैं तेरी, कुछ हैं मेरी,
कभी ये भीगी बरसात मे,
कभी धूप के साए मे खड़ी हैं,
कभी रात के कुछ अनगीने तारों सी,
कभी रास्ते के उस ओर इक मंज़िल सी,
इक धागे से बाँधे है हमे ये,
कुछ हैं तेरी, कुछ हैं मेरी,
कहने को कुछ नहीं,
माने तो इक रिश्ता है,
अनमोल हैं ये मेरे लिए,
मोती तुम्हारी यादें, तो सीपी हैं मेरी,
इनको मान दिया, इनपर ऐतबार किया,
ज़िन्दगी के इस हिस्से को तुमने बिसार दिया,
पर मेरे पास सदा रहेंगीं,
कुछ यादें तेरी, कुछ यादें मेरी
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२८ जनवरी, २००८
31/1/08
कुछ यादें तेरी, कुछ यादें मेरी
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1 comments:
वाह ! क्या खूबसूरती से आपने यादों को समेटा है।
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