21/9/07

ज़िन्दगी का सबक...

आज हम ने वो सबक पढ़ डाला,
जिसे सब ज़िन्दगी की किताब कहते हैं,
और कुछ ऐसा काम कर डाला,
जिसे सब जीने का हिसाब कहते हैं,

कभी कुछ खोया, कभी कुछ पाया,
कुछ पाकर हँसे तो कुछ खो कर दिल रोया,
इसी खोने पाने का नाम ज़िन्दगी है,
बिना इसके ज़िन्दगी को हम नाकाम कहते हैं,
ज़माने से जो मिला, सर आँखों पे स्वीकार किया,
कभी ना सोचा क्या भला और बुरा क्या है,
सभी खुश रहें, कोई किसी से जुदा ना हो,
बस अपनी दुआ मे यही माँगते हैं,

किसी सबक मे दोस्तों ने हँसना सिखाया,
तो कुछ सवालों ने रुलाया भी है,
बस ऐसे ही ज़िन्दगी के धुँधले पन्नों से,
अनुभव के मोती चुनते रहते हैं,

चाहे पत्तों का टूटना हो या पानी का बहना,
ज़िन्दगी हर पल कुछ सिखाती है,
दिखाती है सच और संतोष की राह,
ये हम ही हैं जो सब कुछ अनदेखा कर जाते हैं

चलो कोशिश करें कि कुछ अच्छा सीखें इस ज़िन्दगी की किताब से,
वरना इन बाकी किताबों को पढ़ कर तो हम बिसार देते हैं

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२९ जून, २००७