14/9/07

हमारे पेड़ का क्या होगा?

कुछ साल पहले आँगन मे एक पेड़ लगाया था,
सबसे नीचे जड़ें थी,
सब तकलीफों को सहने के लिए,
पेड़ के बढ़ने के लिए सख्त ज़मीन से पानी खींचता था,

एक तना बढ़ा,
जड़ों की खुशी का ठिकाना ना रहा,
और कड़ी मेहनत की, उसे मज़बूत करने के लिए,

उस तने ने भी वचन दिया,
पेड़ को सदा मज़बूत बनाए रखने के लिए,
अपनी टहनियों का ध्यान रखने के लिए,
उन्हे सहारा देने के लिए,

कुछ पत्ते उग आए कुछ दिनो बाद,
सबकी मेहनत रंग लाई,
उसका फल मिला मीठे मीठे फलों के रूप मे,
हर तरह से सफल था जीवन उस पेड़ का,

पर आज,
आज कुछ और ही अनहोनी हो गई है,
वो पत्ते खुद कहीं और उड़ जाना चाहते हैं,
तेज़ हवा मे कहीं दूर,
डाली से बँधे रहना उन्हे कैद लगता था,

टहनियाँ भी किसी गुरुर मे झूम रही हैं,
ये फल तो उन्ही के कारण उगे हैं,
वो ना हों तो इस पेड़ को देखेगा ही कौन,
लोग झूलते इन्ही पर,
ये अब खुद इक पेड़ बनने को तैयार हैं,

वो तना तो बस एक जगह खड़ा हुआ,
हिलने से मजबूर,
अपनी ऊपरी खाल को खुद से अलग होते देख परेशान,
कभी टहनियों को समझाते,
कभी अपनी जड़ों को कोसते,

और जड़ें!
सूख चुकी हैं वो,
इस उम्र मे ज़मीन से बाहर आकर कुछ देर आराम करना चाहती हैं,
पर डरती हैं, पेड़ के टूट कर गिर जाने से,
दिल के हिस्सों के बिखर जाने से,

अभी भी ज़मीन से पानी खीँचती,
वो सोच रही हैं,
क्या हो गया हमारे पेड़ को,?
क्या हो गया हमारे परिवार को?
क्या हमारा बीज ही खराब है?

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
१० सितम्बर, २००७