बहुत लिखा इधर उधर की बातों पर,
आज अपनी बहन के लिए कुछ लिखने का मन है,
मौके तो यूँ भी बहुत होते हैं,
पर राखी पे कुछ खास भेंट देने का मन है,
कोई कहता इसे भगवान का बनाया रिश्ता,
कोई इसे झूठा दिखावा कहता है,
प्यारा सा बन्धन होगा ये किसी के लिए,
इसे भगवान का दिया उपहार कहने का मन है,
माँ बाप के बाद, बहन भाई के रिश्ते से होती है पहचान हमारी,
एक से दुलार तो दूसरे से तीखे मीठा प्यार मिलता है हमको,
उस दुलार को ठण्डी छाया,
तो इस ए्यार को बाग की बहार कहने का मन है,
यूँ तो रिश्ते कई होते हैं,
पर इस मे छुपे प्यार और टकरार से एक अलग ही लगाव है,
हर चीज़ की इस दुनिया मे कीमत होगी,
पर इस लगाव को अनमोल कह देने का मन है
पूरा साल बित जाता है कोई बात किए बिना,
ये एक दिन है वो सब भुलाने के लिए,
चाहे कई गिले शिकवे हों मन मे,
वो सब भुला देने का आज मन है,
रेश्म का धागा और केसर मे मिले चावल,
इस रिश्ते के पवित्र और आध्यात्मिक होने का एहसास दिलाते हैं,
जितनी खुशियाँ हों इस दुनिया मे, सब मिले मेरी बहन को,
ये लिखते हुए हर बार उससे, राखी बधँवाने का मन है,
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२८ अगस्त, २००७
28/8/07
राखी पर मेरी भेंट
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