बचपन मे सीखा करते थे कि सागर से मोती निकालना सीखो।
मोती चुनते चुनते शायद मै भूल गया कि सिर्फ मोती चुनने से सागर को तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर अपने मन की साँस घुटने लगती है।
बस इन्ही साँसों को फिर से पाने के लिए मओ फिर से अपी कलम का सहारा लेना चाहता हूँ।
अब यहाँ केवल मेरी अपनी रचनाएँ होंगी।
आशा है कि पीछले अपराध भुला कर मुझे एक और मौका देंगें।
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
25/8/07
स्याही से लगे कुछ दाग मिटाने हैं...
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