23/8/07

इन्सान होना यहाँ ज़यादा ज़रुरी नहीं....

मै सोचता हूँ,
इन्सान होना आज शायद ज़यादा ज़रूरी नहीं,
मुझे हिन्दु या सिक्ख होना ही पड़ेगा,
इसाई या जैन हूँ तो भी ठीक है,
पर कहीं इस हिन्दु देश मे
मुस्लिम पैदा होने की गल्ती तो मैने नहीं करदी

सच मे, इन्सान होना इतना ज़रूरी नहीं,
पर अपनी पहचान एक राशन कार्ड की तरह
साथ लेकर घूमना ज़रूरी है,
एक डेढ़ पन्ने का फलसफा ही तो है ज़िन्दगी हमारी,

या कि फिर एक हथियार की तरह,
जो हिफाज़त करेगा तुम्हारी एक पाप के कुएँ मे गिरने से,
कहीं रास्ते मे हो रहे दंगों मे मर गए तो,
पता तो चले कि तुम्हारा करना क्या है,
लोग बहुत डरते हैं "पाप" करने से,

कहीं हिन्दु को दफना दिया तो,
या मुस्लिम कि राख गंगा मे बहा दिया तो,
"अनर्थ" हो जाएगा,
प्रलय आ जाएगी धरती पर

अनर्थ, जो लोग होने नहीं देते,
जैसे एक शादी के वक्त,
"अरे! खून खराब हो जाएगा,"
कितनी चिंता है सबको यहाँ हमारी,
आखिर "वो" हमारे लायक कहाँ,

सच मे, इन्सान होना यहाँ ज़यादा ज़रूरी नहीं,
वोट डालते वक्त भी तो हमे ये याद दिलाया जाता है,
विश्वास दिलाया जाता है कि
नौकरियाँ सिर्फ हमारी जात वालों को ही मिलेंगीं,

भगवान भी निर्दयी है,
अगर वो सबको बराबर समझता,
सब लोग हमारी जात वाले ना होते,

सच मे, यहाँ इन्सान होना ज़यादा ज़रूरी नहीं,
कल एक बुज़ुर्ग के मुँह से सुना कि सब धर्म एक हैं,
मै सोच मे पड़ गया,
कि इन बातों को किताबों मे बंद कर के राख दो,

कम से कम वहाँ तो सुरक्षित हैं,
गर किसी "उस" ने सुन लिया,
तो वो इस बात को भी जला देगा,

सच कहूँ तो मैने एक "पाप" कर दिया था,
एक गैर मज़हबी दोस्त की मदद कर दी थी,
अनर्थ हुआ या नहीं, पता नहीं,
पर दिल को खुशी मिली थी,

मै ये सोच तो रहा हूँ,
बाकी पूरा शहर तो सो रहा है,
आज़ादी अपने देश पहुँच तो गई,
पर अभी तक इन दंगों के बीच एक घर तलाश रही है,

दोस्त मेरे कहते हैं कि अनदेखा कर दो ये सब,
अकेले कुछ नहीं बदल पाओगे,
यानी वो मुझे अपने असूल बदलने को कह रहे हैं,

यही तो मै कह रहा हूँ,
असूल यहाँ ज़यादा ज़रूरी नहीं,
इन्सान होना यहीं ज़यादा ज़रूरी नहीं,

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२२ अगस्त, २००७


kavita ka vishay aur kuch vishay vastu prerit hai...
par bhawnayen aur kuch bhag ko chod kar kavita khud likhne ka prayas kiya hai...
mool kavita kiski hai, jankari nahi hai...