आज एक कवि का मन नाच रहा है, गा रहा है,
क्योंकि उसके घर एक नन्हा मेहमान आ रहा है,
दिल के हर कोने मे हर्ष है, उल्लास है,
आज उसके लिए छोटी से छोटी चीज़ भी कुछ खास है,
खुशी के कुछ शब्द, कुछ भाव लेकर वो नन्हा मेहमान आएगा,
बनेगी एक ऐसी कविता जो प्रकृति का कण कण गाएगा,
इन्द्रधनुष का हर रंग उसके जीवन मे समाएगा,
कन्या हुई तो कनिका, पुत्र हुआ तो प्रकाश कहलाएगा,
प्रतीक्षा के लम्बे अन्तराल के बाद अन्दर से एक नर्स भागती भागती आई,
कवि के हृदय पर बिजली सा वार करती एक अनहोनी बात बताई,
कहा कि आपकी पुत्री माँ का गर्भ त्यागने से इन्कार करती है,
अपने कुछ प्रश्नो, कुछ कटाक्षों से दिमाग पर प्रहार करती है,
वो कुछ सकपकाया, कुछ घबराया,
भागते भागते अपने पत्नी के कमरे मे आया,
इससे पहले कि वो कुछ समझे, कुछ जाने,
कुछ सवाल सुनाई दिए, कुछ नए तो कुछ वही पुराने,
तुम लोगो को कोई अधिकार नहीं है,
एक लड़की को इस दुनिया मे लाने का,
देवी कह कर उसी का अपमान करने वालो,
कोई हक नहीं है तुम्हे पिता कहलाने का,
इस पुरुष प्रधान दुनिया मे कदम रख कर मै क्या पाऊँगी,
हर समय बलिदान के नाम पर अपने अरमानो के साथ कुचली जाऊँगी,
तुम्हारी नज़रें जो मेरे अंगो को नहीं मेरे हृदय को भेदती हैं,
उनसे खुद को किन वस्त्रों, किन दीवारों के पीछे छुपाऊँगी,
और आजकल तो चला तुम लोगो मे एक नया दस्तूर है,
तुम्हारी बातों मे माँ-बहन की गालियों की मात्रा भरपूर है,
अब तक कम से कम अपनी माँ और बहनों को तो इज़्ज़त दी जाती है,
पर अब तो उन्ही को अपमानित करने मे एक पुरुष का गुरूर है,
और तुम तो एक कवि हो, अपने धर्म के पथ पर चलो,
शब्दों की ताकत है तुम्हारे पास, तुम तो यूँ भेड़ चाल मत चलो,
अब मैं इस प्रथा को बदल के रहूँगी,
एक शुरुआत ही सही, पर इसी से एक क्रांति लाकर रहूँगी,
अपने आँदोलनों मे भी तुमने इसी नारी को नग्न कर अपमानित किया है,
अब इस आँदोलन से मैं इस समाज को हिला कर रहूँगी।
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२० दिसम्बर, २००७
20/12/07
आंदोलन....
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1 comments:
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