एक दिन गिरती बूँदों ने अपने बादल से पूछा,
क्यों कोई चाहेगा मेरे जैसा जीवन,
क्यों कोई गिरना चाहेगा इतना ऊपर उठ कर,
क्यों वो फिर मिट्टी मे मिल जाना चाहेगा,
हर वक्त भटकती सी ज़िन्दगी है मेरी,
कभी भाप तो कभी पानी,
हवा के झोंके सी बदलती मेरी कहानी,
बताओ मेरी ज़िन्दगी मे ठहराव कब आएगा,
कहीं तो मेरा घर होगा,
कभी तो मुझे कोई सीपी एक मोती बनाएगा,
कहा बादल ने, मत रखो सोच ऐसी, अपनी आँख नम ना करो,
रात काली सही पर उसका ग़म ना करो,
बूँदे सिखाती हैं ज़िन्दगी जीने का तरीका, सबको ये बताते रहो,
इन फैलती बूँदों की तरह सबमें खुशियाँ बाँटते रहो,
जहाँ दुखी हों लोग, बारीश के पानी की तरह जाओ वहाँ,
बहा ले जाओ सब तकलीफें और खुद सदा मुस्कुराते रहो,
नदियों मे मिलकर आपस मे फासले कम करना सिखाओ,
निर्मल जल की तरह सदा जगमगाते रहो,
सागर की गहराईयों मे अपने ग़म डुबाने सीखो,
और भाप की तरह सब पीछे छोड़ बढ़ते रहो,
सिर्फ मोती नहीं अनमोल, खुशी मे छलका आँसू भी अनमोल है,
ज़िन्दगी मे कहीं रुकना मत चाहो,
मुस्कुराते हुए अपना सफर तय करते रहो,
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
१ अक्तूबर, २००७
3/10/07
बारीश की बूँदें और बादल....
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