23/9/07

शीशे से बनी इक लड़की...

शीशे से बनी एक लड़की,
इस पत्थर के नगर मे आई,
वो ढूँढ रही थी मोती,
इक पत्थर से टकराई,

कुछ सम्भली, उठी फिर से,
देखा कि पत्थर ही पत्थर हैं राहों मे,
सोचा था कि कोई साथ मिलेगा,
पर खुद को अकेला पाकर घबराई,

धीरे धीरे एक लम्बा सफर तय करती,
कुछ भोली सी, हर बात से अन्जानी,
जानती नहीं कि चमकती रेत है सब कुछ,
जो दूर से लगता है निर्मल पानी,

इक शीशे से बनी लड़की,
पत्थर से टकराई,
ढूँढ रही थी वो मोती,
एक पत्थर से टकराई,

कुछ लोग मिले उसको,
खुद को सोना वो कहते थे,
पीतल के बने वो सब हैं,
सब देख कर भी वो समझ ना पाई,

अचानक बरसा कुछ पानी,
इक छत की शरण वो आई,
उस छत मे भी कुछ टूटा था,
शायद वो ये देख ना पाई,

दिन भर की थकन से हारी,
पानी तक भी ना पिया था,
कुछ ढूँढने की कसक मे,
खुद को थी कहीं वो हार आई,

उस लड़की का नाम ज़िन्दगी है,
किसी ने चाहा उसे तो किसी की ठुकराई,
उस पत्थर के नगर मे,
जाने कौन से मोती वो ढूँढने थी वो आई

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२२ सितम्बर, २००७

3 comments:

prabhakar said...

aapane to kafee likha hai\
padhakar achcha laga

Mired Mirage said...

bahut badhiya topic, badhiya upmaen. kavita pasand aai.
ghughutibasuti

deepanjali said...

आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.