इस कड़वी तीखी दुनिया मे लोग मीठी बातें भूल गए,
क्रोध से जलते इन दिनों मे वो ठण्डी रातें भूल गए
हँस कर हुआ करती थी मिलने पर कुछ दुआ सलाम
बेवक्त की इस भाग दौड़ मे सब दिलों की बातें भूल गए
सुबह उठते ही सुनते हैं खबरें कुछ टूटते घरों की
हवस मे पागल इस दुनिया मे सब रिश्ते नाते भूल गए
एक भीड़ को धकेल रहा है हर कोई, हर तरफ एक अलग सी कतार है
कुछ हासिल करने की इस कोशिश मे सब प्यार मोहब्बत भूल गए
क्या है पूजा, क्या नमाज़ है, उलझ रही है दुनिया इसमे
इक मूरत रखने के पीछे, उस एक की मरज़ी भूल गए
भुलाना था इस नफरत को, उस अहम को तजना सोचा था
इस मैं-मेरी के फेर मे पड़ के अंदर की दौलत भूल गए
कभी भीगा करते थे पड़ोस के बच्चे पहली बरसात मे
यूँ खो गए खुद मे कि अपने कमरों से निकलना भूल गए
एक वक्त था, जब सब मिलकर सुख दुख बाँटा करते थे
किसी को छोड़ो, आज तो हम सब खुद से मिलना भूल गए
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२५ जून, २००७
5/9/07
सब मीठी बातें भूल गए...
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1 comments:
अच्छी सोच है अच्चा लिखा है आपने
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