27/8/07

कवि के दिल की बात कोई समझता नहीं...

कवि के दिल की बात को कोई समझता नहीं
कविता तो पढ़ लेता है हर कोई, मतलब कोई समझता नहीं

जब भी वो अपने दिल की बात कहता है, कहते हैं कि सपने बुनता है
पर उन सपनों मे क्या है कोई देखता तक नहीं

जिस के लिए अपना दिल कागज़ पर बिछा दिया
वो उस बंद कागज़ को खोल कर कभी पढ़ता तक नहीं

कहते हैं कि शब्दों से खेलना तो एक कवि का काम है
हर बात को मज़ाक समझते हैं, कोई इसे सच मानता नहीं

करते हैं जब अपनी बात पेड़ पत्तों के बहाने,
तो पूछते हैं कि कवि कोई बात सीधे ढंग से क्यों करता नहीं

फिर एक दिन कह डाला सब कुछ, बिना अक्षरों के सहारे उनसे
पर मेरी किस्मत की वो बेईमान आँखों की ज़ुबान समझता नहीं

एक कवि जब भी कुछ लिखता है, उसका दिल उन शब्दों मे दिखता है
फिर भी वो कहते हैं कि मै अपने दिल मे छुपे राज़ किसी से कहता नहीं

कुछ लिखता हूँ तो हँस कर टाल देते हैं
ना लिखुँ तो कहते हैं कि क्यों तू कुछ लिखता नहीं

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२७ जून, २००७

3 comments:

Basant Arya said...

ham to samajhte hai na ji

परमजीत बाली said...

गुरनाम जी अच्छा प्रयास किया है अपने मनोभावों को व्यक्त करने का।यह पंक्तियां बहुत सुन्दर लगी-
"एक कवि
जब भी कुछ लिखता है,
उसका दिल
उन शब्दों मे दिखता है
फिर भी वो कहते हैं कि मै
अपने दिल मे छुपे राज़
किसी से कहता नहीं"

Udan Tashtari said...

तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.