7/2/07

नहीं मै इतना कमज़ोर नहीं...

आज फिर मै खामोश हो कर बैठ गया, क्या करूँ कुछ कर भी क्या सकता हूँ मै


सब देख कर, हर खामोश चितकार सुन कर, बस आह ही तो भर कर रह जाता हूँ मै
क्या करूँ कोई आक्रोष भरी आवाज़ भी तो नहीं उठा पाता हूँ मैं


हर जगह यही तो हो रहा है
अपने आँसू पोँछने के लिए हर कोई दूसरे की खुशी ही तो खो रहा है
क्या करूँ किसी को ऐसा करने से रोक भी तो नहीं पाता हूँ मै


कहीं कोई रो रहा है, कहीं कोई अपनी अस्मत खो रहा है
और कुछ नहीं तो यहाँ हर कोई किसी अन्जानी मृगतृष्णा के लिए पागल सा हो रहा है


हर कोई मुझसे पूछ रहा है, क्या सही है क्या गलत
मै भी तो कुछ ढूँढता हूँ, हर घड़ी, हर वक्त,
तो किसी को उसकी मंज़िल तक कैसे पहुँचा सकता हूँ मै
क्या करूँ, कागज़ पर भी कलम के सहारे के बिना खड़ा भी नहीं हो पाता हूँ मै


पर नहीं, मै इतना कमज़ोर नहीं
मुझमे भी है कड़कड़ाती बिजली, चाहे मै कोई घटा घनघोर नहीं

मै साहित्यकार हूँ, कहानीकार हूँ, कलम की ताकत जानता हूँ मै
किसी भी परिस्थिति से लड़ने को तैयार हूँ मै


कलम उठाई है मैने तुमसे लड़नो के लिए
इसका सहारा नही लिया मैने, इसको अपना कर ही तो खुद को पहचाना है मैने


ये मत सोचना कि कुछ बोले बिना मै रह जाऊँगा
बस यूँ ही खामोश रह जाऊँगा
अपने खून के उबाल को मै चंद कागज़ के टुकड़ों पर उतार रहा हूँ मै


जानता हूँ जब ये पंक्तियाँ जन-जन तक पहुँचेगीं
मै और भी मज़बूत हो जाऊँगा
बाहर जो हो रहा है, इस कागज़ पर मै वही अंदर करता रहूँगा


याद रखना मै साहित्यकार हूँ
कभी भी खामोश नहीं बैठ पाता हूँ मै
शायद इसी लिए हर किसी की आँखों मे इतनी आशाएँ देख पाता हूँ मै
आखिर तभी तो एक कवि, एक कलाकार कहलाता हूँ मैं


'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी

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