Friday 2 March 2012

मन की उथल पुथल

कोई कविता नहीं,
कोई ख़्वाब नहीं,
कोई साज़ नहीं,
कोई आवाज़ नहीं,

बस एक सन्नाटा है,
चारों तरफ एक खामोशी छाई है,
बहुत लोग हैं आस पास,
फिर भी दिल में तन्हाई है,

मन को घेरा है कुछ यादों ने,
आँखों में बसे कुछ अधुरे ख़्वाबों ने,
खुद से किए कुछ वादों ने,
कुछ नामुमकिन से लगते ईरादों ने,

लगा कि दिल की बात का इज़हार करूँ,
या शायद थोड़ा और इन्तज़ार करूँ,
ढ़ूँढ लूँ कुछ शब्द अपने भीतर से,
फिर कलम के ज़रिए इकरार करूँ,

पर इकरार करूँ तो किस से,
सब लगते यहाँ अन्जान हैं,
शायद वो भी मेरी तरह,
खुद से ही परेशान हैं,

पर फिर भी लिख देता हूँ कुछ ऐसा,
जिस से खुशी झलके,
दिल का बोझ घटाते
दो चार लफ्ज़ हल्के फुल्के,
प्यार के दो शब्द,
जिन्हें पढ़ के मुस्कुरा उठें भीगी पलकें,

क्योंकि कविता है,
तो ख़्वाब हैं,
शब्द हैं तो आवाज़ है,
उँगलियाँ अगर बजाना चाहें,
तो कलम भी इक अनोखा साज़ है,

अकेले में ही साथ मिलता है शब्दों का,
साथ हैं शब्द तो फिर कैसी तन्हाई है,
मुझे अकेला देख के,
मेरी कविता पूरी महफिल साथ लाई है

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२ मार्च, २०१२

Monday 27 February 2012

मन कुछ खोया खोया रहता है


 

मन कुछ खोया खोया रहता है,
उछलता है ज़रा सी खुशी मिलने पर,
और अकेले होने पर उदास हो जाता है,
कुछ तो है जो ये हर वक्त ढूँढता है,
मन कुछ खोया खोया रहता है

कभी किसी अन्जान को भी समझ लेता है अपना,
कभी अपनो से भी दूर रहता है,
छुपाता है सबसे अपना हाल कभी,
कभी बात करने के लिए एक दोस्त ढूँढता है,
मन कुछ खोया खोया रहता है

कभी बचपन मे जाना चाहता है,
कभी जवानी का प्यार पाना चाहता है,
कभी सोचता है कि जी लिया बहुत,
कभी सब कुछ फिर से शुरु करना चाहता है,
जाने क्या चाहता है, जाने क्या करता है,
मन कुछ खोया खोया रहता है

तारीफ का भूखा है,
कोई करे तो हवा में उड़ने लगता है,
प्यार का प्यासा है,
कहीं से मिले तो उसी ओर चल पड़ता है,
रूठ जाए कोई इससे तो,
बच्चे की तरह ज़मीन पार पैर पटकने लगता है,
कभी झूमता है किसी अन्जाने अंहकार में,
कभी भगवान से शिकायत ये करता है,
कभी टिकता नहीं एक जगह पर ये,
ये मन कुछ खोया खोया रहता है,

पीड़ा हो तन की,
या कोई उलझन हो किसी प्रियजन की,
अपनी रातों की नींद ये खोता रहता है,

लालची है खुशियों और अपनेपन का,
हर पल कुछ खोजता रहता है,
पर अन्तर नहीं समझता सपने और सच्चाई में,
सच्चाई को देख अपनी आँखें ये बंद करता है,
झूठ की उम्र खत्म होते ही,
अकेला बैठ कर ये रोता रहता है,
ये मन कुछ खोया खोया रहता है।।।

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२७ फरवरी, २०१२

Tuesday 14 February 2012

वेलंटाईन डे

एक नज़र जो किसी ने हमको देख लिया,
लगा कि खुदा ने अपना कर के देख लिया,

हो गया हर डर मेरे दिल से रुख्सत,
जब किसी के चेहरे पे हम ने मर के देख लिया,

सुना था जानलेवा है एक झलक तक उसकी,
फिर भी उसे छुप छुपके हमने देख लिया,

बादलों में देख कर एक दिन सूरत उसकी,
अपने सफर का रुख उसकी ओर करके देख लिया,

खाली आँखों में ख्वाब भी टिके ना थे आज तक,
ख्वाबों में उसे अपना कर के देख लिया,

उनके इन्कार से नहीं, तकल्लुफ से डर है मुझे,
खुद तो आज बेतकल्लुफ होके हमने देख लिया,

मेरी नादानी उनकी नाराज़गी का सबब होगी बेशक,
पर फिर भी सोचा कि बहुत डर के देख लिया,

जानता हूँ मेरी बातों को अनसुना कार देगी वो,
फिर भी दिल कि बातों को लफ्ज़ों में भर के देख लिया

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
१४ फरवरी, २०१२

Monday 6 February 2012

फलदार पेड़



समय बहुत तेज़ी से बदलता है,
और उस से भी तेज़ लोगों की ज़रुरतें,
पर इन ज़रुरतों को पूरा करने के लिए
कोई मेहनत नही करना चाहता,
सब फल तो खाना चाहते हैं,
पर बीज कोई नहीं बोता,

कोई पेड़ लगाता भी है तो
नीम का, बरगद का,
और कुछ तो मनी-प्लांट की बेल से ही खुश हैं,
कोई फलदार पेड़ नहीं लगाता,
फलदार पेड़ों की देख-रेख बहुत महँगी है,
जितना मीठा फल
उतनी ही खाद,
उतना ही पानी,
और गली के बच्चों के उतने ही पत्थर,

फल आते हैं तो चिड़ियाँ आती हैं,
बहुत गंद फैलाती हैं,
और फिर इन्तज़ार भी तो बहुत करना पड़ता है,
इसलिए पेड़ लगाते हैं बस छाया के लिए,
या घर में हरियाली महसूस करने के लिए,
फल तो बाज़ार से भी मिल जाते हैं,

प्यार भरा दिल रखना भी फैशन में नहीं है,
दिल में जितना प्यार,
उतना ही लोगों से लगाव,
लोगों के दु:ख में उतना ही दु:ख,
उतने ही दिल को ठेस पहुँचाने वाले लोग,
और बदले में किसी का प्यार मिलता ही कितना है,
लोग प्यार जताते हैं बस कोई मतलब निकालने के लिए,
या सोसाईटी में दिखावे के लिए,
हाँ पर प्यार बाज़ार में नहीं मिलता फलों की तरह,

चाहे प्यार भरे निश्छल दिल हो,
या फिर फलदार पेड़,
सबने सिर्फ सुना है कि हुआ करते हैं,

किसी गाँव में शायद,
या हज़ारों में किसी एक पुराने ख्याल वाले घर में,
पता नहीं ऐसा कुछ होता भी है या नहीं...

'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
५ फरवरी, २०१२
क्या करूँ मुझे लिखना नही आता...

कैसी लगी कविताएँ.... बताईएगा ज़रूर....

कुछ मेरे बारे मे... मेरे मुँह से