कुछ रास्तों पर मैं चलता था,
वो राहें जानी अन्जानी सी,
ना मेरी मन्ज़िल की ख़बर उन्हें,
मेरे लिए भी रही वो हमेशा बेगानी सी,
फिर एक मोड़ मुड़ा, एक राह मिली,
जिस से एक पुराना नाता था,
कुछ देर को मैं भी ठहर गया,
कब से इधर उधर भटकता जाता था,
पहले बिठाया अपने पास मुझे,
कुछ अपने बारे मे बतलाया,
फिर मेरे दिल की हर आवाज़ सुनी,
और मुझे एक नई दुनिया से मिलवाया,
शुरु हुए तो रुके नहीं,
जाने कितनी ही बातें थी,
मैं भी बहता गया उनमें,
यादों भरे दिन, कहानियों से सजी रातें थी,
मुड़ती वो राह जहाँ,
मैं भी उसी संग मुड़ जाता,
हर मुश्किल, हर बदलाव में मैं,
उस राह से और भी जुड़ जाता,
मन्ज़िलें थी हमारी अलग अलग,
फिर भी दिशाएँ एक ही थीं,
ना पता कब क्या मिले किसे,
पर अभी तो इच्छाएँ एक सी थीं,
अचानक फिर कुछ बदल गया,
हँसती हँसाती वो राह चुप चाप हुई,
मैं तो था बस हैरान खड़ा,
सोचता कि आखिर ऐसी क्या बात हुई,
पूछा उस से कि आखिर हुआ है क्या,
ये बदलाव क्यों तुम में आया है,
ये प्रश्न से क्यों उठ खड़े हुए,
किस बात पे यूँ मुँह फुलाया है,
उस ने कहा कि इस से तुम्हे है क्या,
क्यों मेरी चिन्ता करते हो,
मैं इक राह, तुम राही हो,
अपनी सीमा से आगे क्यों बढ़ते हो,
तुम मिले तो बस कुछ बात हुई,
मैं तो सब से यूँ ही मिलती हूँ,
चुन लो अपने लिए एक राह नई,
मै अपनी मन्ज़िल चुनने चलती हूँ,
कुछ समझने के इन्तज़ार में,
ये अधूरे शब्द लिए अब भी खड़ा हूँ मैं,
"कौन हो तुम और इस से तुम्हे है क्या?"
उन गूँजते शब्दों के असमंजस मे पड़ा हूँ मैं।।।
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
८ अक्तूबर, २००९





