तारों भरी रात में,
चाँदनी की बरसात में,
शब्दों के जुगनुओं से,
आने वाली काली रातों को भी रोशन करता था,
मैं कविता लिखा करता था,
लिखता था मैं कुछ अपने लिए,
दिल की बातें खुद से बोला करता था,
बस कागज़ कलम थे साथी मेरे,
मैं उनसे खेला करता था,
मैं कविता लिखा करता था,
अपने आस पास की बातों को,
कुछ तारों की हसीन बारातों को,
चाँद को इठलाता देख कर,
मचलते चकोर के छुपे जज़्बातों को,
कुछ मिसरों मे बाँध कर,
मैं नज़मे लिखा करता था,
अपने लिखे को जब मैं पढ़ता था,
गुलाबों सी खुशबू उठती थी,
पूरब से बहती हवा,
तब मेरी तरफ ही मुड़ती थी,
महकती हवा, बहकता समाँ,
उसमे मैं भी बहका करता था,
मैं कविता लिखा करता था,
फिर इक ऐसी ऋतु आई,
वो चाँदनी मुझसे नाराज़ हुई,
तारे भी मुझसे रूठ गए,
हवा की बेरुख सी आवाज़ हुई,
खाली से मेरे लफ्ज़ हुए,
उन मिसरों में भी वो मिठास नहीं,
काली रात, धुँधले तारे,
बादल छटने की भी कोई आस नहीं,
तब से बस खाली दिल मे कुछ जज़्बात ढूँढा करता हूँ,
याद करता हूँ कुछ बातें अपनी,
खाली खाली सी कविता लिखा करता हूँ
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
७ फरवरी, २०१०
08/02/10
08/01/10
कुछ परम् मित्रों के लिए
यादो का एक कंकर जो मन की झील में फेंका,
ठहरे पानी सा रुका दिल मेरा भी मचल उठा है,
उठ के देखा मैने खुद को जब आईने में अपने,
अपने अक्स मे चेहरा मुझे इक ओर दिखा है,
चेहरा था वो मुझसा मगर मुस्कान थी तेरी,
आँखों मे मेरी ख्वाब, ऐ दोस्त, तेरा ही दिखा है,
मिलते हैं कई लोग, यूँ कि एहसान हो जैसे,
ना मिल के भी हर पल मेरा तुझसे ही जुड़ा है,
पल भर की मुलाकात हो या बातें वो अनगिनत,
तेरा कहा हर लफ्ज़ मेरे ज़हन मे गढ़ा है,
कभी ज़िद्द करना, कभी तेरा वो डाँटना मुझको,
तू ही तो इक वजह है जिसे ये दिल माँग रहा है,
छूने चला था नभ की ऊँचाईयाँ इक दिन,
वो पँख थे तेरे जिन्हे थाम परिँदा ये उड़ा है,
थक कर बैठ गया होता मैं राह में कब से,
वो साथ है तेरा कि मंज़िल की तरफ ये दिल दौड़ रहा है,
एक बार जो तुझसे मैं लड़ा, तो सोच रहा था,
यूँ लड़ के रुठ जाने का, हक़ इक तूने ही दिया है,
जाने क्या क्या कह गया वो आईना मुझसे,
यूँ लगा कि कुछ कहते कहते वो भी रो रहा है,
लिखते हैं सब नाम पत्थरों पे अपना,
ऐ दोस्त, तेरा नाम मैने पानी पे लिखा है,
कभी वक्त मिले तो पढ़ लेना तुम मेरे लिखे को,
हर लफ्ज़ है तेरे लिए, तेरे बारे में लिखा है,
चलते चलते कभी यूँ ही देख लेना हाथ बढ़ा कर,
इक शक्स उसे थामने को बेताब खड़ा है
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
८ जनवरी, २०१०
ठहरे पानी सा रुका दिल मेरा भी मचल उठा है,
उठ के देखा मैने खुद को जब आईने में अपने,
अपने अक्स मे चेहरा मुझे इक ओर दिखा है,
चेहरा था वो मुझसा मगर मुस्कान थी तेरी,
आँखों मे मेरी ख्वाब, ऐ दोस्त, तेरा ही दिखा है,
मिलते हैं कई लोग, यूँ कि एहसान हो जैसे,
ना मिल के भी हर पल मेरा तुझसे ही जुड़ा है,
पल भर की मुलाकात हो या बातें वो अनगिनत,
तेरा कहा हर लफ्ज़ मेरे ज़हन मे गढ़ा है,
कभी ज़िद्द करना, कभी तेरा वो डाँटना मुझको,
तू ही तो इक वजह है जिसे ये दिल माँग रहा है,
छूने चला था नभ की ऊँचाईयाँ इक दिन,
वो पँख थे तेरे जिन्हे थाम परिँदा ये उड़ा है,
थक कर बैठ गया होता मैं राह में कब से,
वो साथ है तेरा कि मंज़िल की तरफ ये दिल दौड़ रहा है,
एक बार जो तुझसे मैं लड़ा, तो सोच रहा था,
यूँ लड़ के रुठ जाने का, हक़ इक तूने ही दिया है,
जाने क्या क्या कह गया वो आईना मुझसे,
यूँ लगा कि कुछ कहते कहते वो भी रो रहा है,
लिखते हैं सब नाम पत्थरों पे अपना,
ऐ दोस्त, तेरा नाम मैने पानी पे लिखा है,
कभी वक्त मिले तो पढ़ लेना तुम मेरे लिखे को,
हर लफ्ज़ है तेरे लिए, तेरे बारे में लिखा है,
चलते चलते कभी यूँ ही देख लेना हाथ बढ़ा कर,
इक शक्स उसे थामने को बेताब खड़ा है
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
८ जनवरी, २०१०
23/12/09
कविता लिखनी हो तो खुशी की लिख
कविता लिखनी हो तो खुशी की लिख,
इनको बीती यादों मे ना डुबोया कर,
बहुत कुछ है आज में लिखने के लिए,
इस आज की खुबसूरती को शब्दों में पिरोया कर,
घर से बाहर निकल,
देख गली मे कितनी चेहल पेहल है,
हर चेहरे की एक अलग कहानी,
उस कहानी के रंगीन किरदारों की मुस्कान में अपनी कलम को डुबोया कर,
खुद को अकेला कहने से दोस्त नहीं बनते,
ना उदास बैठने से कोई किसी को हँसाने आता है,
खुशी की सिर्फ चाह नहीं उसकी तलाश कर,
ज़्यादा देर तक अपनी आँखें ना भिगोया कर,
हर बात को देखने का अलग नज़रिया है,
हर बात को कहने के कई अन्दाज़ हैं,
सच ज़रुरी नहीं कि हमेशा कड़वा ही हो,
अपने लफ्ज़ों को प्यार की मिठास से भिगोया कर,
कोशिश करने से मुरझाए चेहरों पर मुस्कान आ जाती है,
दिल मे छुपे जज़्बातों को एक नई ज़ुबान मिल जाती है,
बिना हिचकिचाए कह दे जो भी है दिल में तेरे,
बच्चों की तरह इन्हे अपने अन्दर ना छुपाया कर,
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२३ दिसम्बर, २००९
इनको बीती यादों मे ना डुबोया कर,
बहुत कुछ है आज में लिखने के लिए,
इस आज की खुबसूरती को शब्दों में पिरोया कर,
घर से बाहर निकल,
देख गली मे कितनी चेहल पेहल है,
हर चेहरे की एक अलग कहानी,
उस कहानी के रंगीन किरदारों की मुस्कान में अपनी कलम को डुबोया कर,
खुद को अकेला कहने से दोस्त नहीं बनते,
ना उदास बैठने से कोई किसी को हँसाने आता है,
खुशी की सिर्फ चाह नहीं उसकी तलाश कर,
ज़्यादा देर तक अपनी आँखें ना भिगोया कर,
हर बात को देखने का अलग नज़रिया है,
हर बात को कहने के कई अन्दाज़ हैं,
सच ज़रुरी नहीं कि हमेशा कड़वा ही हो,
अपने लफ्ज़ों को प्यार की मिठास से भिगोया कर,
कोशिश करने से मुरझाए चेहरों पर मुस्कान आ जाती है,
दिल मे छुपे जज़्बातों को एक नई ज़ुबान मिल जाती है,
बिना हिचकिचाए कह दे जो भी है दिल में तेरे,
बच्चों की तरह इन्हे अपने अन्दर ना छुपाया कर,
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२३ दिसम्बर, २००९
24/11/09
एक माँ जैसी कलम
एक माँ जैसी है मेरी ये कलम,
पालती है मेरे शब्दों को अपनी कोख में,
वहीं उन्हे सीँचती है जाने कितने ही भावों से,
और फिर जन्म देती है किसी गीत, किसी कविता को,
जब भी रोते बिलखते हैं मेरे गीत,
उन्हें कागज़ की कोरी सेज पर थपकियाँ देकर सुलाती है,
उन्हे भेज देती है सपनों की दुनिया में,
और मिलाती है उन्हें नई आशाओं से ये कलम,
नई दुनिया, नए लोग,
हर चेहरे के पीछे छुपे सच और कई ढोंग,
अपने शब्दों और गीतों को दुनियादारी समझाती है ये कलम,
बच्चे बड़े हुए,
उन्होनें एक शोख़ अन्दाज़ लिया,
प्यार के एहसास मे डूब गया वो,
सब कुछ नया सा नज़र आता है,
उनके दिल की हर बात को बिना कहे समझ जाती है ये कलम,
किसी से मिलने की खुशी हो,
या दिल टूटने का दर्द,
हर पल अपने बच्चों का साथ देने के लिए,
उनके आस पास ही मिल जाती है ये कलम,
दुख ने जब भी घेरा उन्हें,
छुप छुप कर रोती है वो,
आँसु उसके टपकते हैं स्याही बन,
कागज़ का सीना भी जल उठता है उन आँसुओं की तपिश से,
कहीं दिख ना जाए उसका दर्द किसी को,
कागज़ को सब छुपा लेने की कसम देती है ये कलम,
बच्चे बड़े हुए तो रूठ भी जाते हैं माँ से,
कैसे मनाए, इस से अन्जान, मासूम सी ये कलम,
बस अकेली बैठी, उनके लौटने का इन्तज़ार करती ये कलम,
सबसे दुखी हो,
जब भी इसको गले लगा कर रोया हूँ,
इसके दिलासे भरे प्यार की ठंडक मे जब भी सोया हूँ,
मेरे मन के हर बोझ को खुद पर ले कर,
एक माँ की तरह लोरी सुनाती है ये कलम,
सब कुछ अपनी कोख में छुपा कर फिर चुप हो जाती है ये कलम,
एक माँ के जैसी ही तो है मेरी ये कलम
'आपामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२३ नवम्बर, २००९
पालती है मेरे शब्दों को अपनी कोख में,
वहीं उन्हे सीँचती है जाने कितने ही भावों से,
और फिर जन्म देती है किसी गीत, किसी कविता को,
जब भी रोते बिलखते हैं मेरे गीत,
उन्हें कागज़ की कोरी सेज पर थपकियाँ देकर सुलाती है,
उन्हे भेज देती है सपनों की दुनिया में,
और मिलाती है उन्हें नई आशाओं से ये कलम,
नई दुनिया, नए लोग,
हर चेहरे के पीछे छुपे सच और कई ढोंग,
अपने शब्दों और गीतों को दुनियादारी समझाती है ये कलम,
बच्चे बड़े हुए,
उन्होनें एक शोख़ अन्दाज़ लिया,
प्यार के एहसास मे डूब गया वो,
सब कुछ नया सा नज़र आता है,
उनके दिल की हर बात को बिना कहे समझ जाती है ये कलम,
किसी से मिलने की खुशी हो,
या दिल टूटने का दर्द,
हर पल अपने बच्चों का साथ देने के लिए,
उनके आस पास ही मिल जाती है ये कलम,
दुख ने जब भी घेरा उन्हें,
छुप छुप कर रोती है वो,
आँसु उसके टपकते हैं स्याही बन,
कागज़ का सीना भी जल उठता है उन आँसुओं की तपिश से,
कहीं दिख ना जाए उसका दर्द किसी को,
कागज़ को सब छुपा लेने की कसम देती है ये कलम,
बच्चे बड़े हुए तो रूठ भी जाते हैं माँ से,
कैसे मनाए, इस से अन्जान, मासूम सी ये कलम,
बस अकेली बैठी, उनके लौटने का इन्तज़ार करती ये कलम,
सबसे दुखी हो,
जब भी इसको गले लगा कर रोया हूँ,
इसके दिलासे भरे प्यार की ठंडक मे जब भी सोया हूँ,
मेरे मन के हर बोझ को खुद पर ले कर,
एक माँ की तरह लोरी सुनाती है ये कलम,
सब कुछ अपनी कोख में छुपा कर फिर चुप हो जाती है ये कलम,
एक माँ के जैसी ही तो है मेरी ये कलम
'आपामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२३ नवम्बर, २००९
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