कोई कविता नहीं,
कोई ख़्वाब नहीं,
कोई साज़ नहीं,
कोई आवाज़ नहीं,
बस एक सन्नाटा है,
चारों तरफ एक खामोशी छाई है,
बहुत लोग हैं आस पास,
फिर भी दिल में तन्हाई है,
मन को घेरा है कुछ यादों ने,
आँखों में बसे कुछ अधुरे ख़्वाबों ने,
खुद से किए कुछ वादों ने,
कुछ नामुमकिन से लगते ईरादों ने,
लगा कि दिल की बात का इज़हार करूँ,
या शायद थोड़ा और इन्तज़ार करूँ,
ढ़ूँढ लूँ कुछ शब्द अपने भीतर से,
फिर कलम के ज़रिए इकरार करूँ,
पर इकरार करूँ तो किस से,
सब लगते यहाँ अन्जान हैं,
शायद वो भी मेरी तरह,
खुद से ही परेशान हैं,
पर फिर भी लिख देता हूँ कुछ ऐसा,
जिस से खुशी झलके,
दिल का बोझ घटाते
दो चार लफ्ज़ हल्के फुल्के,
प्यार के दो शब्द,
जिन्हें पढ़ के मुस्कुरा उठें भीगी पलकें,
क्योंकि कविता है,
तो ख़्वाब हैं,
शब्द हैं तो आवाज़ है,
उँगलियाँ अगर बजाना चाहें,
तो कलम भी इक अनोखा साज़ है,
अकेले में ही साथ मिलता है शब्दों का,
साथ हैं शब्द तो फिर कैसी तन्हाई है,
मुझे अकेला देख के,
मेरी कविता पूरी महफिल साथ लाई है
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२ मार्च, २०१२
कोई ख़्वाब नहीं,
कोई साज़ नहीं,
कोई आवाज़ नहीं,
बस एक सन्नाटा है,
चारों तरफ एक खामोशी छाई है,
बहुत लोग हैं आस पास,
फिर भी दिल में तन्हाई है,
मन को घेरा है कुछ यादों ने,
आँखों में बसे कुछ अधुरे ख़्वाबों ने,
खुद से किए कुछ वादों ने,
कुछ नामुमकिन से लगते ईरादों ने,
लगा कि दिल की बात का इज़हार करूँ,
या शायद थोड़ा और इन्तज़ार करूँ,
ढ़ूँढ लूँ कुछ शब्द अपने भीतर से,
फिर कलम के ज़रिए इकरार करूँ,
पर इकरार करूँ तो किस से,
सब लगते यहाँ अन्जान हैं,
शायद वो भी मेरी तरह,
खुद से ही परेशान हैं,
पर फिर भी लिख देता हूँ कुछ ऐसा,
जिस से खुशी झलके,
दिल का बोझ घटाते
दो चार लफ्ज़ हल्के फुल्के,
प्यार के दो शब्द,
जिन्हें पढ़ के मुस्कुरा उठें भीगी पलकें,
क्योंकि कविता है,
तो ख़्वाब हैं,
शब्द हैं तो आवाज़ है,
उँगलियाँ अगर बजाना चाहें,
तो कलम भी इक अनोखा साज़ है,
अकेले में ही साथ मिलता है शब्दों का,
साथ हैं शब्द तो फिर कैसी तन्हाई है,
मुझे अकेला देख के,
मेरी कविता पूरी महफिल साथ लाई है
'आपकामित्र' गुरनाम सिहं सोढी
२ मार्च, २०१२




